राजनीति विज्ञान विभाग, रामदयालु सिंह महाविद्यालय में आज बाल गंगाधर तिलक की जयन्ती के दिन उनके योगदान को याद करते हुए किया गया एक विशिष्ट परिचर्चा का आयोजन ।

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मुजफ्फरपुर -राजनीति विज्ञान विभाग, रामदयालु सिंह महाविद्यालय मुज़फ़्फ़रपुर में आज बाल गंगाधर तिलक की जयन्ती के दिन उनके योगदान को याद करते हुए एक विशिष्ट परिचर्चा का आयोजन किया गया।

परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर नीलम कुमारी ने तिलक को आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण वयक्तित्व बताया। उनके द्वारा रचित ‘गीता रहस्य’ उनकी दर्शन के प्रति रुचि और कृष्ण के प्रति आस्था को उजागर करती है। स्वराज्य, स्वदेशी और बहिष्कार उनके जीवन के मूल बिंदु थे जिनपे वे अडिग रहे और भारतीय स्वाधीनता के लिए संघर्ष करते रहे।

वे राष्ट्रवाद के मनोवैज्ञानिक अवधारणा पे अत्यधिक जोर देते थे।लोकमान्य तिलक के राजनीतिक चिंतन को ‘लोकतांत्रिक, यथार्थवाद पे आधारित राष्ट्रवाद की संज्ञा दी जा सकती है।

कार्यक्रम के संयोजक डॉ0 रजनी कान्त पाण्डेय ने तिलक को राजनीतिक चिंतन में कर्मयोगी बताया और कहा कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में कई प्रयोग किये जिसे बाद में गांधी और अन्य महापुरुषों ने अपने जीवन मे अपनाया।

डॉ0 पवन कुमार ने कहा कि बाल गंगाधर तिलक महान भारत के एक समाज सुधारक ,राष्ट्रवादी, शिक्षक ,स्वतंत्रता सेनानी और महान देश भक्त थे उन्होंने भारतीय समाज की स्थिति को सुधारने के लिए तथा अंग्रेजी से गुलाम भारत को मुक्त कराने के लिए उस समय की एक मात्र भारतीय कांग्रेस पार्टी में सामिल हुए और सामाजिक व्यवस्था पर गहन चिंतन और सुधार की पूरी कोशिश करने लगे लेकिन कांग्रेस की धूल मूल रवैया से नाराज होकर 1907 में पार्टी छोड़ दीया था होम रूल आंदोलन शुरू किया करती के दौरान ही उन्होंने कहा था कि ,स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा उनकी इस नारा से ये हमे सिख मिलती है की अपने अधिकार को किसी से मांग कर नहीं बल्कि उससे छीन कर लेना चाहिए तिलक के गरम दल की तीव्र आने से भारत आजाद हुआ और गुलामी के जंजीर से मुक्त हुआ|

डॉ0 साकेत ने तिलक के लखनऊ समझौता में उनके योगदान और हिन्दू मुस्लिम एकता को उनका महत्वपूर्ण योगदान बताते हुए उन्हें एक महान राष्ट्रवादी बताया।

डॉ0 मीनू ने कहा कि लोकमान्य बालगंगाधर तिलक सबसे पहले ब्रिटिश राज के दौरान पूर्ण स्वराज की मांग उठाई। लोकमान्य तिलक ने जनजागृति का कार्यक्रम पूरा करने के लिए महाराष्ट्र में गणेश उत्सव तथा शिवाजी उत्सव सप्ताह भर मनाना प्रारंभ किया। इन त्योहारों के माध्यम से जनता में देशप्रेम और अंग्रेजों के अन्यायों के विरुद्ध संघर्ष का साहस भरा गया।