सियाचिन में तैनात भारतीय सैनिक, जूझ रहे हैं संसाधनों की कमी से…

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‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत के महालेखा परीक्षक यानी सीएजी ने कहा है कि सियाचिन में तैनात भारतीय सैनिकों के पास सर्दियों के लिए विशेष कपड़ों और साज़ो-सामान के भंडार में भारी कमी है। सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि सैनिकों को ज़रूरत के मुताबिक खाना भी नहीं मिल पा रहा है। रक्षा मंत्रालय ने सीएजी से कहा है कि कमियों को ठीक कर लिया जाएगा।

वहीं एक सैन्य अधिकारी ने अख़बार से कहा है कि सीएजी की ये रिपोर्ट साल 2015-16 से 2018-19 के दौरान की है और अब चीज़ों को सुधार लिया गया है। सियाचिन में तैनात एक सैनिक की पोशाक पर क़रीब एक लाख रुपए तक का ख़र्च आता है।

…कहने को सियाचिन का अर्थ गुलाबों की बगिया होता है। पर आज यह कांटों के ताज से कम नहीं है। दुश्मन से मुकाबला नहीं है फिर भी शहादत का क्रम जारी है। दुश्मन के गोले नहीं हैं, गोलियों की बरसात नहीं है फिर भी सैंकड़ों जवान वीरगति को प्राप्त हो रहे हैं। वीरगति भी ऐसी की मौत से पहले ही आदमी मौत के नाम से कांप उठे। रात को शून्य से 50 डिग्री नीचे तापमान। ऐसे में दुश्मन और प्रकृति से जूझना। जूझना भी ऐसा कि शत्रु के गोले मात्र तीन प्रतिशत जानें लेते हैं तो प्रकृति 97 प्रतिशत। मौत अगर आ भी जाए तो चिता भी नसीब नहीं होती। उसी बर्फ के नीचे दफन होना पड़ता है जिसमें शरीर कभी गलता नहीं तथा जिसे तोड़ कर पानी बनाया जाता है क्योंकि ‘जीवन रेखा’ माने जाने वाले ‘गरूड़’ हैलिकाप्टर अगर पानी लाते भी हैं तो वह जम कर बर्फ हो जाता है।

ऐसे दृश्यों को याद कर उनके रोंगटे खड़े हो जाने स्वाभाविक है जो एक बार उस युद्ध मैदान में ड्यूटी निभा चुके हैं जिसे सियाचिन हिमखंड कहा जाता है। जो विश्व का सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित युद्धस्थल ही नहीं बल्कि सबसे खर्चीला युद्ध मैदान भी है जहां होने वाली जंग बेमायने है क्योंकि लड़ने वाले दोनों पक्ष जानते हैं कि इस युद्ध का विजेता कोई नहीं हो सकता। युद्ध की कथाओं को सुनने वालों के लिए युद्ध की तस्वीर आंखों के समक्ष खींचने में अधिक परेशानी नहीं होती लेकिन सियाचिन हिमखंड में होने वाली लड़ाई की तस्वीर वे नहीं खींच पाते जो बेमायने तो है ही सही मायनों में यह युद्ध दुश्मन के साथ नहीं बल्कि प्रकृति के साथ है जो होने वाली मौतों के 97 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है। ऐसी परिस्थितियों के बावजूद भी जवान दिन रात डटे रहते है, यदि उन्हें संसाधन की कमी होगी तो ये मौजूदा सरकार के साथ साथ सभी देशवासियों के लिए शर्म की बात होगी।